
हमका बस पियार चाही(अवधी कविता)
पैसा सोना चांदी टीवी फ्रिज ना हमका कार चाही।मिलय मेहरूवा सीधी साधी सुन्दर व्यवहार चाही।।मानय हमका लरिका जस अस हमका ससुरार चाही।सालिक मानी बहीनी जस

पैसा सोना चांदी टीवी फ्रिज ना हमका कार चाही।मिलय मेहरूवा सीधी साधी सुन्दर व्यवहार चाही।।मानय हमका लरिका जस अस हमका ससुरार चाही।सालिक मानी बहीनी जस

मुरझान डेरान मुंह बनाए एक दिन फुल कहय माली से।का बिगारेंन तुम्हार हम जवानिम तुरत हमका डाली से।।काटत छाटत सबसे बचाए खाद अउर डारत पानी।बिरवस

अन्न ज़िंदगी मनाई सब कय अन्न कय सम्मान करव ।अन्न कईहां सुरक्षित राखव अन्न कय ना अपमान करव ।।मेहनत औ पसीना बहाई कय अन्न उब्जावत

समाज कहय जिनका दलित उनके जाति कुम्हार।माटी तोड़ी मरोड़ी कय बनावत जग कय पालनहार।।लरिके बिटिए अउर मेहरूवा पालत घर परिवार।वाह जमाना भगवान का आज सब

सुन री मेरी मनोरमे, नव वर्ष का आना बाँकी है,हिन्द व हिंदी माँ, उर्दू जैसी मौसियों, को मनाना है। बसंत पंचमी से, माँ का पद

फूल खिला है आँगन में कितना सुंदर लगता है! उडे खुशबू चहुँ ओर तब जब झोंका पवन का चलता है करे ईर्ष्या कण्टक उससे क्यों

जो चम- चम चमकता नित आठों याम है दुनिया वालों आज बता दूँ वही घनश्याम है सीना ताने जीयो प्यारे इस संसार में शोषण उसका

जीवन पर्यंत आवश्यक होती है आग भोजन न मिलने पर पेट में लगती है आग भोजन मिलने पर परहृदय में लगती है आग जीवन दायनी

नीर भरी दु:ख की बदली मैं, तरसूँ और बरसाऊँ। बिन तुम्हारे श्याम प्यारी, मैं खिन-खिन हो जाऊँ॥ वियोग तुम्हारा मुझसे अब तो, क्षण- भर सहा

जिसने मुझको ज्ञान देकर, ऋषियों का सम्मान दिया है। क्या है उचित और क्या अनुचित है, जिसने मुझको ज्ञान दिया है॥ जीवन की अलबेली राहें,