कविता

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आज महफिल दिलों की सजा लीजिए

आज महफिल दिलों की सजा लीजिएअपने दिल की उदासी मिटा दीजिएकोई गम ना रहे अब किसी बात काआज जी भर के तुम मुस्कुरा लीजिएकोई साथी

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सुनता रहा मैं

सुनता रहा मैं उसकी बोला न ताव में,हर मोड़ पर रहा मैं उसके प्रभाव में।फिर भी मिली है मुझको दर्दे जुदाइयां,जाने वही क्या चल रहा

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मैं अपनी दुनिया सौंप दूं

मैं अपनी दुनिया सौंप दूं तेरे हाथों में।मिटा तो ना दोगे तुम।।अगर इजहार कर दूं अपनी मुहब्बत का।तमाशा बना तो ना दोगे तुम।।जख्म कई लिए

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निगाहें वहां पर हो

निगाहें वहां पर हो जहां होंसले पस्त होते हैं।चिराग वहां जलाओ जहां सूरज अस्त होते हैं।।क्या लेना दुनियादारी की चापलूसी से।जो साफ दिल होते हैं

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ऋतुराज बसंत मनभावन

चढ़ल बसंती रंग धरा ज्यों, मन में भईल तरंग।लहेलहे लहेके सरसों फुलवा , कोईल करे उमंग।रितु बासंती आवत बाटे , गछिया करे बयान ।गीत मनोहर

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मुझसे शादी करोगी?

प्रेम में भावुक हो रहा हूं मैंअपना ईमान दोगी ?प्रेम में पागल हो रहा है मेरा दिलमुझसे शादी करोगी ? तू जच रही है मेरे

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भारतम!

हम भारत के सच्चे बच्चे,हार न मानें अच्छेहमें है जीना ,आगे बढ़नायही अरमान है हमारा हम मिट जाएंगे पर ,वतन झुके न हमारामरकर भी मेरा

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कविताएँ

मैंने कविताओं को मरते देखा।उस वक्त देखा,जब यह अन्याय के खिलाफ लिखने की सोचती है ।हजारों बार तो यह रात कोसिरहाने बैठकर घंटों तक रोती

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