कविता

Category: कविता

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परछाईं

वे जब भी रोशनी में आते हैं,उन्हें मुँह चिढ़ाती है उनकी परछाईं |कभी छोटी, कभी बड़ी,कभी प्रश्नवाचक,कभी विस्मयादि मुद्राओं में आकार लेतीउन्हीं के अस्तित्व का

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मैं मंत्रों की हृदय धारा हूँ

चाहो तो जड़ देना ताले दुनियां भर की किताबों पर लेकिन नहीं बना सकते तुम ऐसी कोई दीवार जो पहरे बैठा दे मुझ पर मैं

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सृष्टि का उपहार है नारी

सृष्टि का उपहार है नारीनारी बिना सबकुछ सुना हैनारी तत्व ही दिव्य ज्योति हैउसके बिनासबकुछ अनसुना है। नारी तत्व से प्रेम निखरता हैनारी तत्व है

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नया साल : कुछ कविताएँ

1.कुछ न कुछ बदलेगा जरूरक्यों कि बदल गया है मौसमदीवारों पर टंग गए हैं –हरे-भरे दृश्यों वाले नये कैलेण्डरकुछ और रंगीन हो गए हैंडालियों पर

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न जाने कौन हूँ मैं

अन्तर्द्वंदों के शिखर पर खड़ा सा मौन हूँ मैं। न जाने कौन हूँ मैं…… गहन तिमिरान्ध में प्रकाश हूँ मैं, छलकते आंसुओं की आस हूँ

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