कविता

Category: कविता

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मजदूर

करते हैं दिन रात परिश्रम तब जाकर जी पाते हैंकिसी तरह से जीवन में वो अपना पेट पालते हैंसुनना पड़ता है मालिक की डांट हमेशा

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मेरा हृदय उद्गार

हर एक मुस्कुराहट पहचान लेंगे हमगम है छुपा या खुशी इसको जान लेंगे हमकितना भी छुपाओ इसे अब दिल में रखकर तुमक्या चल रहा है

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तो कैसे सुधरेगे हालात

मजहब के रंग में रंगा हुआ जो पूरा देश है आजतो कैसे सुधरेगे हालातलूट के अपने देश की दौलत खुद बनते धनवानतो कैसे सुधरेंगे हालातसब्र

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कम लिखना भी बहुत कठिन है

विस्तृत लिखना भले कठिन होकम लिखना तो बहुत कठिन हैभाव उजागर हो जाए मन काशब्द पिरोना बहुत कठिन हैभरा हो शब्दों में भाव जितनाउसे समझना

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सहरिन से पुरवा बही (अवधी रचना -दोहा )

सहरिन से पुरवा बही पहुंची हमरे गांव बिसरे राम जोहार अब टोकैं लय लय नाव , सीतलता जल से गयी बानिस् गयी मिठास कुंवक् जगति

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सुबह का सूर्योदय नभ

सुबह का सूर्योदय नभसे करता रहता ऐतबारओ मेरे प्रियतमतुझसे है प्रेम का इजहार । आ जा बाहों में ओकुसुम तुम्हे दरकारओ मेरे प्रियतम तुमसे हैप्रेम

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हजार खूबियां देखी कमी वफा देखा

उसकी आंखों में मैंने उठता वो मंजर देखाघाव दिल में बनाते आंख का खंजर देखाकरके तिरछी निगाहे ओठ पे मुस्कान लिएखिलते महलो को बनाते हुए

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