।। पतंग मेरी तुम उड़ने दो ।।
।। पतंग मेरी तुम उड़ने दो ।। सर्दी में मुझे ठिठुरने दो, हाथों को रील से कटने दो । पर पतंग मेरी तुम उड़ने दो,
।। पतंग मेरी तुम उड़ने दो ।। सर्दी में मुझे ठिठुरने दो, हाथों को रील से कटने दो । पर पतंग मेरी तुम उड़ने दो,
अश्कों को पलकों पे सजाया है, एक गीत लबों पर आया है । कहां से चले और कहां पे पहुंचे, ये दौर कहां पर हमें
प्राप्त है जितना वही पर्याप्त होना चाहिए आंखों में आंसू नही मुस्कान होनी चाहिए गम में रहकर भी खुशी का भाव होना चाहिए एक सा
गुमसुम उदास सी बैठी हो मैं पास तेरे आ जाऊं क्या फूलों का गजरा बंन तेरे बालों को महकाऊ क्या खिले सुनहरी धूप तेरे होठों
मैं कवि नहीं हूं दिल के बस उद्गार लिखता हूं, नफरतों को दूर कर बस प्यार लिखता हूं। भाई-बन्धु और रिश्तों में घुले है जो
समय के साथ बदले यार,उनका प्यार बदला है, नहीं बदला तो केवल मैं,मेंरा अधिकार बदला है। वही हम हैं, वही हैं यार,जमाना भी वही है
दिया धोखा मुझे तुमने तो फिर अपना बनाया क्यों, कोई तुमको पसंद था और तो मुझको सताया क्यों। तुम्हारी मंजिलें थी क्या?था मकसद तुम्हारा क्या?
नहीं , मैं सागर नहीं हूँकि तुम्हारे द्वारा फेंके गयेशिला-खण्डों कोज्वार-भाटे के जबड़े में जकड़ लूँ ताल हूँतुम्हारा लघु पत्थर भीआन्दोलित कर जाता हैकेन्द्र से
पात्रता तो मुझमें कहाँ है फिर भी अभिनय कर रहें हैं सोंच में तेरे मर रहे हैं।। देखने को उर में मेरे, उठ रही अभिलाष
प्रतिबिंब पर मत टिकें बिंब कुछ तो और है मनुज जग का सिरमौर है।। सिंधु के उद्दाम लहरों को, नाप डाला है मनुज हवाओं पे