पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

दोहा

ढूंढ रहा था मन जिसे,होकर बड़ा उदास

ढूंढ रहा था मन जिसे,होकर बड़ा उदास,नहीं दिखाई दे रही,लिया आज अवकाश।लिया आज अवकाश,हमेशा मुझे सताए,सबसे करती बात, नहीं यह मुझको भाए।बना बहाने रोज, झूठ

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गीत

वीरांगना लक्ष्मीबाई

कह रही है इक वीरांगना,मुझसे मेरी भू मत माँगना। क्रोध से भरी रक्त से सनी,वीरता की प्रतिमूर्ति खड़ी।राष्ट्र और प्रजा सुरक्षित हो,बस यहीं है उसकी

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गज़ल

क्या मुश्किल है

उनको हमसे प्यार नहीं है क्या मुश्किल है । हालांकी इनकार नहीं है क्या मुश्किल है । अपनेपन की रजनीगन्धा महक रही है । रिश्तों

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गज़ल

दूर तक सूखे हुए पत्ते मुहब्बत के(ग़ज़ल)

दूर तक सूखे हुए पत्ते मुहब्बत के । खिल नहीं पाये कभी गुंचे मुहब्बत के । किस क़दर कमज़ोर थे अपने नशेमन भी । आंधियों

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