पद्य-रचनाएँ

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गीत

चार साहबजादे

हे गुरु गोविंद सिंह के लाल, तुमने कर दिया खूब कमाल । प्राण दे दिए अपने हंसकर, पर नही झुकाया कभी भाल ।। वजीर खान

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कविता

शांत रुदन

शांत रुदन अन्सुअन भी साथी मेरे ——————————- अरे यह क्या!अचानक बंद हो गई कहाँ गए सब आँसू आँखों के ? सूख गए! आवाज़ें निःशब्द हो

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कविता

रंग इन्द्रधनुष

धरती का हरापन सदा से बुलाते रहे मुझेमैं उसके आँचल में दूब बनकर पसर गया ,नीला विस्तृत आकाश हुर्र बुलाता रहा मुझेमैं उसमें घुसकर नीलकंठ

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पद्य-रचनाएँ

हाइकु

1सींग के दानेपेट की आग सिंकेभीगते बेचे। 2सूर्य सुखाताउपले-भित्ती टँगेगाँव की यात्रा। 3जहाजी पक्षीवस्त्र बदल थकायात्रा एकाकी। 4सूखे तालाबटूटी पसली गिनेरश्मि ‘एक्स रे’। 5जामुन फलेपेड़

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ताँका

ताँका

1शोख अदाएँतितली ठुमकतीगोदभराईकलियाँ शर्माती हैंमाली की बाँछें खिली । 2भारी हैं- पाँवफूलों-तितलियों केखबरें उड़ीसौंदर्य बिखरा हैलोग बलैयां लेते । 3निगल जातीभूख की लंबी जीभसारी हेकड़ीक्या-क्या

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पद्य-रचनाएँ

सेदोका

1पेड़ काँपतेचश्मा बदले मालीबढ़ई हुआ मनदिखा सर्वत्रआरी,कुल्हाड़ी संगबाजार के सपने। 2भीगी हैं लटेंउड़ रहा दुपट्टावर्षा में भुट्टा खानास्मृति ताजीसौंदर्य दमका हैमिट्टी की सुगंध सी। 3पिंयरी

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गज़ल

अब कोई खिलता नहीं है गुल मेरे गुलदान में

अब हमारे इश्क़ के ,खाली खज़ाने हो गएअब नहीं चलते हैं ,सिक्के जो पुराने हो गए जो हमें देखा किये सड़कों पे मुड़ मुड़ के

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