पद्य-रचनाएँ

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गीत

माण्डवी

दिव्य मणि शोभित शुभी अभिसारिका सी। अवध की महानायिका परिचारिका सी।। भूमिजा का स्वयंवर पिनाक भंग, आ गयी थी देखने पितु मातु संग। गौरी पूजन

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गज़ल

गज़ल-बाखब़र होके मगर सोता रहा

बाखब़र होके मगर सोता रहा। तमाम रात सितम होता रहा।। मजाल समंदर की कुछ भी नहीं, माझी ही कश्तियां डुबोता रहा।‌। ये कैसा मर्ज़ है

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कविता

पाती

नैन नीर में मसि मिलाकर हमने लिख दी प्रिय को पाती। भावो को लिपिबद्ध सजाकर बैरंग भेजी प्रिय को पाती।। मन पक्षी विहरत अनन्त तक

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कविता

मृगतृष्णा

एषणाओं की धरा पर‌ पनपती मन मृग में तृष्णा। जीव को चौरासी घट पट तक घुमाती है मृगतृष्णा।। आशाओं की प्रबल सरिता प्रवाहित अविरल मनस

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गज़ल

गज़ल-शाख से टूटा है, क्या जाने किधर जायेगा

शाख से टूटा है, क्या जाने किधर जायेगा। हवा चली है तो कुछ जे़रो ज़बर जायेगा।। जिगर के खून से हमने लिखे हैं खत इतने,

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कविता

प्रेम पिपासा

अपरिछिन्न अलौकिक अविरल निश्छल सुसंस्कार कहां है। सदा से विलसित रहने वाली प्रेम सुधा रसधार कहां हैं। नव मालिका कली से भंवरा कहता है, सदा

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पद्य-रचनाएँ

कैसे बताउँ यार

क्या गुजरी थी दिल पर कैसे बताउँ यार। पीहर को जा रही मेरी पत्नी पहली बार।। मधुमास का मौसम था शादी मेरी हुई थी। पत्नी

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गीत

प्रेम रस

जीवन पथ अति कठिन कंटक घनेरे। प्रेम रस का पान कर मन मधुप मेरे।। यह समूची सृष्टि ऐषणित तंत्र है, प्रेम ईशाकार परम स्वतंत्र है।

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गज़ल

गज़ल-शबनमी शोले वस्ल-ए- शबाब और क्या क्या

शबनमी शोले वस्ल-ए- शबाब और क्या क्या। लचकती शाख पे ताजा गुलाब और क्या क्या। जमाले रुख पे कातिल अदा नशीली नज़र ज़मीं पे आगया

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कविता

प्रेम दीप

निर्जनों में भी सहज मधुमय सदा सुखवास करती। प्रेम दीप की अमर ज्योति अंतसों में प्रकाश करती।। झंझावातों के भंवर से पार करती, मुक्तिपथ सुलभा

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