पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

गज़ल

मेरा हौसला था

गिराने वालों ने कब तरस खाया, ये मेरा हौसला था,सम्हालता रहा ।। हर कदम पर बाधाएं मिली मुझको, फिर मंजिल की तरफ बढ़ता रहा ।।

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पद्य-रचनाएँ

हमेशा ही मुहब्बत से वो सारे काम लेते हैं

सनम तन्हाई में हम बस तेरा ही नाम लेते हैं तेरी खातिर ही सर अपने सभी इल्जाम लेते हैं किसी के काम आ कर हम

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कविता

अब बहारें भी

अब बहारें भी मेरे घर में,आती नही है, अब हवाएं भी तेरा,संदेशा लाती नही है ।। किस ओर चले गए,तुम छोड़कर मुझको, ये सदायें भी

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कविता

धन्य धन्य गुरु गोविंद सिंह, है धन्य तुम्हारे लाल । धन्य तुम्हारे त्याग है, है धन्य धन्य बलिदान ।। ऋणी रहेगा युगों युगों तक, ये

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कविता

धर्मराज का अंतर्मन

विनाश हुआ कौरव वंश का, पांडवों ने विजय थी पाई युधिष्ठिर का राजतिलक करके, द्वारिका को लौट गए कन्हाई, जाने क्यूं धर्मराज का, ह्रदय बहुत

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पद्य-रचनाएँ

टूटे मन के भ्रम

टूटे मन के भ्रम सभी,हुआ नहीं विश्वास, प्रण कर ले अब तो मना,नहीं किसी की आस। नहीं किसी की आस,भरोसा खुद पर करना, रिश्ते तो

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