
ये नज़र है या कोई पुरानी शराब है
चन्दन सा बदन लबों पे ताजा गुलाब है। कुछ लोग कह रहे के ये माहताब है। जिस पड़ी उसे फिर होश कभी न हुआ, ये

चन्दन सा बदन लबों पे ताजा गुलाब है। कुछ लोग कह रहे के ये माहताब है। जिस पड़ी उसे फिर होश कभी न हुआ, ये

मन शांत लिए ही स्थिर सी आज बैठ गई थी मानों एकाग्रता में सोच पाऊँगी अपने को व अपने भविष्य को झांक पाऊँगी स्वयं में,

आसमानों का परिन्दा कर दिया । वक़्त ने हमको अकेला कर दिया । यूं किसी ने चीर कर मेरा ज़हन । रूह के जाने का

कुछ खट्टी सी कुछ मीठी सी कुछ प्यार भरीं कुछ खार भरीं कुछ सौंधी सौंधी महक लिये कुछ यादगार कुछ भाव विमल कुछ रिश्तों की

कट-कट दन्त करें झर-झर कुहासा गिरे, कोमल बदन शीत थर थर कँपावत है। खर पतवार सब बीनि के एकत्र करें, सूखी घास ठण्डी में सब

मां से बोली बेटी मां मैं भी पढ़ने जाऊंगी।पढ़ लिख कर के इस जग में मैं खूब नाम कमाऊंगी।कलम किताब लेकर के मैं भी स्कूल

धरा है, जिनकी रचना, उन्हीं को, केवट रीझा रहा है।जिनकी करूँ ना, गंगा मैया, उन्हीं का पद रज, चुरा रहा है इंग्लिश अपनी राम की

Know the mother, as much as one can,But remember the pain,Of the night, by scorpion,She is bearing the pain,May be, for some reasons,Let come the

माँ मैथिली गुरु, ख़गेश्वर नाथ,वाली जुबानी है,कोरे, काग़ज़, पे लिख लो,शाँति यही बस आनी है,विश्वविद्यालय बिहार, नालंदा,खुली कहानी है। धीश देखें, जग धीश देखें,पीने न

ट्विन टावर यदि बोल पाता तो कहता-पलक झपकते ही मुझे जमींदोज करने वालों,कल तुम भी शामिल थे मुझे बनाने में।मुझे ये तो नहीं पता कि