पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

कविता

आग

जीवन पर्यंत आवश्यक होती है आग भोजन न मिलने पर पेट में लगती है आग भोजन मिलने पर परहृदय में लगती है आग जीवन दायनी

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कविता

नीर भरी दु:ख की बदली

नीर भरी दु:ख की बदली मैं, तरसूँ और बरसाऊँ। बिन तुम्हारे श्याम प्यारी, मैं खिन-खिन हो जाऊँ॥ वियोग तुम्हारा मुझसे अब तो, क्षण- भर सहा

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कविता

गुरु परिचय

जिसने मुझको ज्ञान देकर, ऋषियों का सम्मान दिया है। क्या है उचित और क्या अनुचित है, जिसने मुझको ज्ञान दिया है॥ जीवन की अलबेली राहें,

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कविता

घरों की दास्तान

काँटों में उलझता हिन्दुस्तान देखता हूँ। घरों में होती दास्तान देखता हूँ॥ सैंतालिस में हुआ था तब बँटवारा इक बार, अब घरों में बनता पाकिस्तान

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कविता

शब्द से चेतना तक नयन ही नयन

शब्द से चेतना तक फैले हुए हैं हर तरफ नयन ही नयन नयनो की अपनी लिपि अपनी भाषा अपनी विधा अपनी सूक्तियां अपने दोहे अपनी

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कविता

मैं कहता हूं कि तुम भुला दो मुझे

मैं कहता हूं कि तुम भुला दो मुझे,कान्टेक्ट लिस्ट से हटा दो मुझे,ड्राइव से फोटो मिटा दो मेरी,गैलरी से पिक्चर हटा दो मेरी,सोशल साइट पर

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पद्य-रचनाएँ

लंका जलाइए(घनाक्षरी)

रावण दुष्ट पापी नीच अथवा कुकर्मी था,उसकी वो सजा पाया,उसे भूल जाइए।आज की दशा को देखो,गली गांव नुक्कड़ में,उठेगी नजर यदि,रावण ही पाइए।होती है गलानि

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ज्ञान दायिनी हे मातु(घनाक्षरी)

ज्ञान दायिनी हे मातु,वीणा पाणि सरस्वती,दया दृष्टि थोड़ी सी तो,मुझपे दिखाइए।मैं अजान बालक हूं चरणों में मातु तेरेज्ञान चक्षु खोल मेरो मन हरसाइए।धवल वस्त्र धारिणी

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हे दीनबंधु(घनाक्षरी)

हे दीनबंधु कृपा सिंधु वीर बलदाऊ कै,विनती हमारी प्रभु आप सुन लीजिए।जगत के पाप हरो सबके संताप हरो,आइए प्रभु जी फिर अवतार लीजिए।गीता वाला ज्ञान

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