पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

कविता

स्पर्धा

निरंतर आगे बढती चल तू मंजुकभी निराश न होना बस चलती जानान हताश होना बस बढ़ती जानाआगे आगे चलना होगानही पीछे मुड़कर कभी देखना होगातू

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कविता

साथ अपनो को

प्रकाश का मार्ग, अतिसुंदरदेखने मे मनमोहित होता हैंपर न जाने क्यो मुझे रीतापन सा लगता हैंचारो और रंगीन लाइटो की चकाचोंध तो है बेशकपर क्या

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कविता

निष्कर्म

निष्कर्म भाव से ही,प्रकृति देती हमको सबक्यो फिर पीछे हैं मानव उसके पोषण में अब।धरा के रूप को नमी को सवारना होगा अबअब चेत जा

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कविता

अनाम रिश्ते

इस दुनिया में न जाने कितने, रिश्तों की यहाॅ॑ भरमार हुई। दिल का रिश्ता सबसे प्यारा, दुनिया खुशियों से गुलजार हुई। कुछ बन जाते अनाम

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कविता

कविता का औघड़

वन के दुःख दर्द अमंगल, सबसे प्रीत निभाऊंँ रे। मैं कविता का औघड़ साधू, धूनी अलख जगाऊँ रे।। जिनकी खुशियों को सपनों के चन्द लुटेरे

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गज़ल

वक्त

वक्त ने बनाया मुझे वक्त से दीदार करूं वक्त के है हक में मुझे चाहे की इंकार करे समय का फैसला जिसका श्रृंगार करू जो

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कविता

प्रेम

मौसम का फिजा यू बदलने लगा ना तुम होश में थे ना मैं होश में लगा देखा जिस ने उसी ने कहा ये कौन सा

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कविता

पुलवामा

टुकड़ों में बटां था, रखवाला गद्दार था ,कोई घरवाला जान ना सका इरादा उसका दुश्मन को धूल चटाने वाला बांट दिया था ,टुकड़ों में गद्दारों

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कविता

नारी

है नारी जग की क्यारी जीवन उसकी न्यारी न्यारी रखती सबका ख्याल है जीवन सवारी सवारी दायित्व परिवार का वंश और घरवार का रिश्ते में

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