पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

खनक रहे सिक्के!

बाज़ारी आँधी में जीवन-मूल्य हुए तिनके ! बाहर- बाहर चमक-दमक भीतर गहराता तम दीमकज़दा चौखटों पर लटके परदे चमचम संवेदन-स्वर क्षीण-क्षीणतर खनक रहे सिक्के !

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फन

हवा के शोर में संगीत सुनना छोड़ दूँ क्या ? जख्म है दिल में, तो जीना छोड़ दूँ क्या ? बेवफ़ाई तेरा फन , जो

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अमृत

जहां जो भी उपलब्ध है, वहां वही अमृत। जैसे विस्तृत जगत में, सकल चराचर जीव ।।

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तेरी गली

किताब में फूल की सूखी पंखुड़ी मिली है। रास्ता मिलता रहा पर मंज़िले ,ना मिली है। तुम्हारे दरों दीवार को पहचानता हूं, तेरे चेहरे की

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विरान

विरान हुआ जंगल , तब बरसात आई है।जनाजा बनगया जिस्म, तब दवा आई है।तपन में ढूंढता तुझको रहा बगीचे;बागों में-लगी जब आग मेरे घर,तब हवा

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पथ के राही

मैं कहीं पर रूक न पाया! एक हृदय ले इस जगत में, पथ पे अपना पग बढ़ाया। राह में छाया सघन थी, पंछी ने आवाज

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माँ

शोणित था माँ का दूध नहीं था तुम्हें गर्भ में जो थी पिलाती लाने को दुनिया में तुमको सहा था माँ ने दर्द अपरिमित आये

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खो गए हैं

खो गए हैं स्वार्थान्धकार में मानव की मानवता,पुरुषों का पुरुषार्थ औरत की पवित्रता,पापी का पश्चाताप प्रेम भाई के प्रति भाई का, पिता-प्रेम मानव का मानव-मात्र

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