शंकर सुमन
शंकर सुमन

शंकर सुमन

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नारी

है नारी जग की क्यारीजीवन उसकी न्यारी न्यारीरखती सबका ख्याल हैजीवन सवारी सवारी दायित्व परिवार कावंश और घरवार कारिश्ते में लाती मिठास हैयह दस्तूर है

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पत्नी

पत्नी रहती है इंतजार में अब वो भी प्यार में कहती है खटूस हर वक्त इजहार में मां के बाद पत्नी व्यवहार में हर जगह

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एहसास

है जिंदगी तू बनू कहानी में सुनती रहे तू ऐसी बानी मैं गुन -गुनाऊ मैं बन जाए गीत तू साज हो धड़कन मेरी हो जाए

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चार पैसे की जिंदगी

चार पैसे की जिंदगी ,लाखों कमाने लगे हम अपने घरों से दूर जाने लगे मां-बाप ना घर द्वार मिले ,पैसे की रस्म निभाने लगे बीवी

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गीत तू

गीत तू मैं गुनगुनाऊ एहसास दिल की सुनाऊं है जहां में गम सभी को आ तुझको मैं दिखलाऊ गम है तुझको किस बात का हाथ

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नगर

हो उद्धार शहर का मेरे आप बनाए सवेरे अब तो कुछ प्रण करो शहर को मेरे स्वर्ग करो नालियों में है कूड़ा करकट मच्छर भी

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मानव

कुछ जानबूझ के कुछ अनजाने में किया करते हैं हम उनको कैसे कह दे अकेले ही जिया करते हैं फितरत है दुनिया की हर रोज

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जाना मेरा तय है

जाना मेरा तय  है अपना ना  बनाओ ओ दिलरुबा इसे ठिकाना ना बनाओ गुजर जाएगा वक्त बहाना ना बनाओ दिल है साफ- साफ दीवाना ना

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सफर

खुशी-खुशी बीत जाए जिंदगी का सफर कौन यहां रहने आया जग में जो आया वही भरमाया कौन यहां रहने आया कल्पना क्या करें सभी सरताज

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भक्त

  स्वागत है वंदन तेरा  तू बना ले चंदन मेरा  दमका करूंगा मैं भी  तू अपना ले अभिनंदन मेरा    गंगा को मिला संग तेरा

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