पूनम गूँजा
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पूनम गूँजा

जगन्नाथ पूरी, ओड़िशा, Copyright@पूनम गूँजा/इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |

इंसानियत

सुना था, आज भी लोगों में कुछ तो इंसानियत बाकी है,पर यहां हर चेहरा, अब छलावा, फरेबी, धोखेबाज सा लगता है।यकीन पर यक़ीनन, अब यकीन

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आजादी की उड़ान

उड़ान इतनी आसान न थी,न था कोई साथ।सूखे पत्ते को जीवंत करना,थी जैसे कोई बात। अड़चनें थी, फिर भी उम्मीद थी,अंधियारे में जैसे कोई जलता

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बहुत कुछ छूटा सा, बचा हुआ

बहुत कुछ छूटा सा, बचा हुआ,कहने को, करने को,जैसे सब रह गया।भावनाएं जो मन से लिपटी हुई,कहना चाहा था,पर दिल को थामना पड़ा। बातें कई

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छुअन प्रेम का

प्रेम जो दो दिल, दो इंसान को एक कर दे,दो शरीर होकर भी एक जान कर दे। घाव किसी एक को लगे, दूसरा घायल हो

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गति जीवन की

जब जीवन नीरस सा प्रतीत हो,जब हर क्षण मुश्किलों का भवंर हो।जब अपना कहने को कोई नहीं,जब हर रिश्ता छले, जीवन कहर हो।उम्मीदों की आस

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मन बावरा

अंधियारे में खोया हुआ मन बावरा,नाउम्मीदी से उम्मीद लगाए हुए।तूफान कोई उठने को आतुर सी है,जल रहा, लपटे लिपटने को है।प्रेम है, या शत्रु, पास

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जीवन

जीवन पुष्पों की पंखुड़ी जैसी नहीं होती,यंत्रणा देने वाली कांटे, चुभती रहती है।मृत्यु की सेज में जो जाना भी चाहों,न जाने क्यों, ज़िंदगी और लंबी

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एक स्वाभिमानी स्त्री

वो पढ़ी, अथक् प्रयास किये,फिर वो आत्मानिर्भर बनी,अपने पैरों पर खड़ी हुई।उसने अपना और अपने माँ पापा का,मान बढ़ाया, सम्मान किया,ज़िम्मेदारी निभाई। कहाँ वो चुक

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कर्म और उसके फल

कितना आसान होता है, कुछ नामुरादों के लिए,रिश्तों में कपट करना, छ्लना, फरेब करना।अपनी बातों से फिर जाना, पलट जाना।अपने स्वार्थ् में अँधा हो जाना।रिश्तों

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स्त्री, स्वरुप शक्ति का

स्त्री के बिना क्या सोचा जा सकता ये संसार??स्त्री के बिना क्या सोचा जा सकता घर परिवार??स्त्री के बिना क्या हो सकता समाज का उद्धार??

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