हमने तो उसे निहारा रात दिन
जिंदगी में कभी जो मिल ना सका
मिल गया था जिंदगी में जो मुझे
पाके उसको कभी खुश हो ना सका
जिंदगी भर मैंने तराशा था जिसे
ऐसा पत्थर था हीरा वो बन ना सका
कमियां दूजे की सदा देखा मगर
कमी खुद में भी है, भान हो ना सका
धन कमाने में सारा जीवन खो दिया
लक्ष्य जीवन का कभी मुझे मिल ना सका
बात तो अधिकार की करता रहा
ज्ञान कर्मों का कभी हो ना सका
जब नशा दिल में अहम का छा सा गया
जिंदगी में कोई अपना हो ना सका
सामने मेरे खड़ा जब वो मिला
देख कर उसको मैं चुप रह ना सका
बात में मिस्री जो घोली प्यार की
तब गिला दिल में कोई रह ना सका
“कर्म ही जीवन का रस” जब से सुना
इच्छा फल की फिर कभी कर ना सका
जब से पाया है जगत का प्रेम मैंने
दुनिया का कोई गम भी ना मिल सका
मिल गई दुनिया की मुझको हर खुशी
कोई गम मुझको विचलित कर ना सका
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


