प्रेम दिलों में जगा है जबसे दर्द दिलों का बढा है तबसे
ओ जब से समझा है प्यार मेरा मजा है जीने में और तब से
दिलों से सीचा जो ए गुलिस्ता भरी है बागे बाहर तब से
खत्म अंधेरा हुआ अहम का प्रेम का दीपक जला है जब से
जबसे उनकी सूरत देखी आग दिलों की बुझी है तब से
शेर भी गीदड़ से है डरा अब तुम्हारा खत यह पढ़ा है जब से
टूट गए है ये सारे सपने हाथ में खंजर रखा है जब से
अश्क का सागर भरा दिलों में दर्द का तूफान उठा है जब से
दिखी ना हरियाली प्रेम की जब ए दिल तो बंजर बना था तब से
ओ जब से जीवन में मेरे आए भंवर भी लगता किनारा तब से
गिरा जो अपनों की ठोकरो से भरा इन आंखों में पानी तब से
अंधेरा छाया है अब दिलो मे अहम दिलों में पला है जब से
ए जिंदगी है किराए का घर ये बात जाना है मैंने जब से
छोड़ ईश को किसी पे मैंने कभी भरोसा किया ना तब से
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


