गज़ल-बेपर हुए

पंख रहते हुए भी बेपर हुए
परिन्दे जो क़फ़स के अन्दर हुए !

पत्थरों को बना डाला देवता
पुजारी जैसे स्वयं पत्थर हुए !

कह रहा था गिद्ध चिंतित बाज से
‘ लोग देखो चंचुधर बेहतर हुए ! ‘

वफ़ा के वादे, मुहब्बत के क़रार
सधा मतलब और छू-मंतर हुए !

खुद न जिनको रहगुजर मालूम है
इन दिनों वे ही बड़े रहबर हुए !

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2 Comments

  • डॉ आनंद कुमार त्रिपाठी September 20, 2025

    यह ऑनलाइन प्लैटफ़ार्म एक सुंदर प्रयास है
    कृपया भविष्य में मुझसे लेखन या आलेख मूल्यांकन हेतु संपर्क कर सकते है, मैं राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय में सह आचार्य हूँ । यह एक केंद्रीय विश्वविद्यलय है ।
    डॉ रवीन्द्र उपाध्याय जी की रचना बहुत उच्च कोटि की और व्यंग्यात्मक शैली का जीवंत उदाहरण है । मैं अतिशय प्रभावित हूँ ।

  • डॉ आनंद कुमार त्रिपाठी September 20, 2025

    भाषायी समस्या

    रोने की गर भाषा होती ,
    क्षेत्र विशेष तक हम रो पाते ,
    हँसने की गर भाषा होती ,
    हम खुलकर भी हँस न पाते ,
    तेरी भाषा मेरी भाषा ,
    अहं ब्रह्मास्मि में हम पड़ जाते ,
    मातृ भाषा मात्र भाषा
    इस चक्कर में हम फँस जाते ,
    मातृ भाषा से ख़तरा किसको ,
    हम सब अपना शीश नवाते ,
    आओ सीखें ऐसी भाषा ,
    जिस भाषा में रो -गा -कह पाते ॥
    डॉ आनंद कुमार त्रिपाठी ,सह आचार्य विधि ,राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय ,गांधीनगर ,गुजरात ,गृह मंत्रालय ,भारत सरकार ।

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रचनाकार

Author

  • डॉ रवीन्द्र उपाध्याय

    प्राचार्य (से.नि.),हिन्दी विभाग,बी.आर.ए.बिहार विश्वविद्यालय,मुजफ्फरपुर copyright@डॉ रवीन्द्र उपाध्याय इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है| इन रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है|

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