“पता है आज होली खेली जा रही है.” स्त्री स्वर
“हाँ…”, उदासीन पुरुष स्वर.
“तो…!!”
“तो?”
“हम भी खेलें?”
“हाँ.”
“लो अबीर का थाल.”
“थाल?”
“पहले ये भी तुम्हें कम लगता था.”
“तब बात कुछ और थी.”
“अब क्या हो गया?”
“अब ये बच्चे खेलते हैं, उनके अपने तरीके से, हमारा क्या?”
“बच्चे या वंशज? अब हम पूर्वज हो गए हैं.”
“हूँ… सालों गुज़र गए.”
“ऊंहूँ, शताब्दियाँ.”
“हूँ… होली तो पूरी बदल गई है.”
“और तुम?”
“मैं… मैं, वही का वही, और तुम?” मुस्कराहट के साथ स्वर.
“वैसी की वैसी. फिर… हम तो खेलें… वही… वैसे ही”. आग्रह करता स्वर.
“चलो राधा…” अगले ही क्षण उत्साहित स्वर.
“चलो कान्हा…” पुलकित स्वर.
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