अमृत

जहां जो भी उपलब्ध है,

वहां वही अमृत।

जैसे विस्तृत जगत में,

सकल चराचर जीव ।।

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रचनाकार

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  • डॉ दिवाकर चौधरी

    कल्याणी प्रतिभा हो मेरी, मधुर वर्ण-विन्यास न केवल||Copyright@डॉ दिवाकर चौधरी इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |

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