।। रिश्ते।।
दामिनी दमकी गगन में फिर निराशा छा गयी वो पास कैसे आ गयी।। टिकते नहीं रिश्ते पुराने, जग में ऐसा वाद है जनक सुत संग
दामिनी दमकी गगन में फिर निराशा छा गयी वो पास कैसे आ गयी।। टिकते नहीं रिश्ते पुराने, जग में ऐसा वाद है जनक सुत संग
चहुंओर दिख रहा पानी – पानी कीचड़ से गीली चूनर धानी। बच्चे कागज की नौका दौड़ाये हाल नदी की वही पुरानी।। खतरों से वह खेल
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में क्यों लड़ते हो, ऊंच नीच और जाति भेद कर आपस में ही मरते हो। एक ही ईश्वर के सब
कड़कड़ाती ठंड में,जल से फसल सींचते है, जब कार्य पूर्ण न हो,आराम नही वो करते है । मेरा शत शत प्रणाम, है अन्नदाता को, जो
आंखों में तुझको देखा है मैंने आंखों में तेरे एक ख्वाब देखा है हुस्न ए रूप में भी आफताब देखा है जिंदगी में अगर होते
ये नफऱत,ये दहशत ये दिलों की दूरीकब मिटेगी ?? ये शिक़वे, शिक़ायत व बदले की आगकब बुझेगी ?? ये लालच,चोरी व दौलत की भूखकब मरेगी
पंख रहते हुए भी बेपर हुएपरिन्दे जो क़फ़स के अन्दर हुए ! पत्थरों को बना डाला देवतापुजारी जैसे स्वयं पत्थर हुए ! कह रहा था
…उस दिन से जी भर जिया नहीं पानी में हूँ मगर एक बूंद भी पीया नहीं कि जब भी चाहा आईने में देखूं अपना अक्श
जिस्मों के भीड़ में अब रिश्तों की बात हो, हैवानियत से मिलचुके अब फरिश्तों की बात हो। मुहब्बते सरजमीं से कर लाखों ही मर-मिटे, अब
लम्बी, छोटी नाजुक उंगलियाँ समवेत गोलबन्द होती हैं हथेली पर जब -मुट्ठी बन जाती है उनकी नजाकत अचानक हो जाती है मुट्ठी की ताकत हथेली