
ढूंढ रहा था मन जिसे,होकर बड़ा उदास
ढूंढ रहा था मन जिसे,होकर बड़ा उदास,नहीं दिखाई दे रही,लिया आज अवकाश।लिया आज अवकाश,हमेशा मुझे सताए,सबसे करती बात, नहीं यह मुझको भाए।बना बहाने रोज, झूठ

ढूंढ रहा था मन जिसे,होकर बड़ा उदास,नहीं दिखाई दे रही,लिया आज अवकाश।लिया आज अवकाश,हमेशा मुझे सताए,सबसे करती बात, नहीं यह मुझको भाए।बना बहाने रोज, झूठ

आसमा जब अहम का झुक जाएगा मैं ही सब कुछ हूं जेहन पनप जाएगा तब अहम का नशा दिल में छा जाएगा देगा कुछ भी

फिर से मानवता घबराई है, फिर से एक आहट आई है । करोना अबकी मत आना, तुमको ये राम दुहाई है । इस मुश्किल से

मुझे गिराने की जिद जमाना कर रहा है, मुझको मिटाने कोशिश जमाना कर रहा है । वक्त से जंग आजकल, मेरी,चल रही है, कभी मैं

कह रही है इक वीरांगना,मुझसे मेरी भू मत माँगना। क्रोध से भरी रक्त से सनी,वीरता की प्रतिमूर्ति खड़ी।राष्ट्र और प्रजा सुरक्षित हो,बस यहीं है उसकी

इन्सां मर भी जाये चेहरा रह जाता है । अब्बा चल देते हैं बेटा रह जाता है । किसने किसको चाहा किसने नफ़रत की थी

बह गये हैं याद के घर वक़्त के सैलाब में । झर गये सुरख़ाब के पर वक़्त के सैलाब में । मौन के पर्वत ठहाकों

इमली के पेड़ों के पीछे छुपे हुए हो तुम । या मौसम की बेचैनी में भरे हुए हो तुम । नदिया की नीली आँखों में

उनको हमसे प्यार नहीं है क्या मुश्किल है । हालांकी इनकार नहीं है क्या मुश्किल है । अपनेपन की रजनीगन्धा महक रही है । रिश्तों

दूर तक सूखे हुए पत्ते मुहब्बत के । खिल नहीं पाये कभी गुंचे मुहब्बत के । किस क़दर कमज़ोर थे अपने नशेमन भी । आंधियों