पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

कविता

बाबा साहेब अम्बेडकर को समर्पित

अंधेरा बहुत था, मगर आगे बढ़ने चला था। पढ़ना मना था, फिर भी पढ़ने चला था।। बहुतों ने चाहा हराना उसे, अकेले ही दुनिया हराने

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कविता

सबरी के राम

सबरी राह देख रही है, रघुवीर मेरे कब आयेंगे । नैन मेरे अति व्याकुल है, कब इनकी सुधा मिटाएंगे ।। पथ से कंटक नित्य हटाती

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नवगीत

सारियाँ

भारतीय परिधान सुंदर क्यों विमुख हैं नारियां खूब फबती सारियाँ ।। माँग में सिंदूर लठवा, तन सुशोभित सारी लसे देखकर मन पथिक का, बरबस उसी

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नवगीत

मदारी

कैद कर कब तक रखोगे मैं सदा दुनियां से हारी क्या कर रहा पागल मदारी।। प्रतिबंध पग-पग पे लगाया, लगाम तूं इतना कसा असत् जाल

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पद्य-रचनाएँ

एक एक ग्यारह बने

एक एक ग्यारह बने, तीन पाँच को छोड़ भाग घटाना त्याग कर, अपना गुणा व जोड़ अपना गुणा व जोड़, शून्य को साथ मिला कर,

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कविता

मौसम

मौसम के भी गजब नजारे, लगते कितने मन को प्यारे । कभी शरद तो कभी बसंत, पतझड़ के अंदाज निराले ।। जब ग्रीष्म ऋतु से

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