
बाबा साहेब अम्बेडकर को समर्पित
अंधेरा बहुत था, मगर आगे बढ़ने चला था। पढ़ना मना था, फिर भी पढ़ने चला था।। बहुतों ने चाहा हराना उसे, अकेले ही दुनिया हराने

अंधेरा बहुत था, मगर आगे बढ़ने चला था। पढ़ना मना था, फिर भी पढ़ने चला था।। बहुतों ने चाहा हराना उसे, अकेले ही दुनिया हराने

सबरी राह देख रही है, रघुवीर मेरे कब आयेंगे । नैन मेरे अति व्याकुल है, कब इनकी सुधा मिटाएंगे ।। पथ से कंटक नित्य हटाती

भारतीय परिधान सुंदर क्यों विमुख हैं नारियां खूब फबती सारियाँ ।। माँग में सिंदूर लठवा, तन सुशोभित सारी लसे देखकर मन पथिक का, बरबस उसी

कैद कर कब तक रखोगे मैं सदा दुनियां से हारी क्या कर रहा पागल मदारी।। प्रतिबंध पग-पग पे लगाया, लगाम तूं इतना कसा असत् जाल

एक एक ग्यारह बने, तीन पाँच को छोड़ भाग घटाना त्याग कर, अपना गुणा व जोड़ अपना गुणा व जोड़, शून्य को साथ मिला कर,

फिर घुमड़ी आकाश में , बादल बादल भोर । अब के जाने क्या करे , ये मौसम घनघोर । आंगन में आकाश से , उतरी

मौसम के भी गजब नजारे, लगते कितने मन को प्यारे । कभी शरद तो कभी बसंत, पतझड़ के अंदाज निराले ।। जब ग्रीष्म ऋतु से

अभी तो शाम बाकी है जरा सूरज ये ढलने दो चले जाना कहाँ रोका है चंदा तो निकलने दो नहीं रोको नहीं मुझको मैं तो

अगर मुझ पर कभी तेरा इशारा हो गया होता डूबती धार में मुझको किनारा मिल गया होता कभी भी लड़खड़ा करके न गिरता फिर तो

मिटा अंधेरा रात का , उतरी मन में भोर । आंखों में कलियां खिलीं , नयनों नाचे मोर । उड़ती फिरती बाग में , संग