पद्य-रचनाएँ

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पद्य-रचनाएँ

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी

पंडितजी मदन मोहन ने, अंग्रेजी सत्ता को हिलाया था, सत्यमेव जयते का नारा, सारे विश्व में छाया था ।। सत्य त्याग और देशभक्ति का, अनूठा

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कविता

अतीत के गवाक्ष में नारी

सुनते हैंकथाओं में कभी स्वर्ण युग थेजब चेतनाओं परकोहरा न छाया था गुनाह काजमीन ज्यादा औरलोग कम थेखुला आकाश बेफिक्र होकर देख सकते थेकोई भी

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नवगीत

चेहरे कितने रूपहरे

बस एक चेहरा थाबेशक रूपहरा थाकोई खास किरदार नहींचेहरा भ्रांत,क्लांत,अशांतकिसी परिभाषा में नहींचेहरा जिस परसंवेदना का रेखांकन नहींएक छवि भर हैचेहरे का कोई चरित्र नहींचेहरा

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गज़ल

शफक

वो वक्त जबएक दीर्घ यात्राके बादनिस्तब्ध दिशा पश्चिम मेंअस्ताचल की औरजाते सूरज कीशफक भाव विभोर करती हैंआँख से आत्मा तकएक वन्दनीय छवि उकरआती हैंसौम्यता से

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कविता

गाँव जा रहा हूँ

आज फिर अपने गांव जा रहा हूँ वही पीपल, सिमल और बरगद के छाँव जा रहा हूँ आज फिर अपने गाँव जा रहा हूँ फिर

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गज़ल

ख्वाब

नजरें मिलाने को बेताब थे गर मिले तो ये क्या हो गया ख्वाब – ख्वाबों में ही खो गया।। वासना होती क्षणिक है, जलधार मे

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