
मेरा हौसला था
गिराने वालों ने कब तरस खाया, ये मेरा हौसला था,सम्हालता रहा ।। हर कदम पर बाधाएं मिली मुझको, फिर मंजिल की तरफ बढ़ता रहा ।।

गिराने वालों ने कब तरस खाया, ये मेरा हौसला था,सम्हालता रहा ।। हर कदम पर बाधाएं मिली मुझको, फिर मंजिल की तरफ बढ़ता रहा ।।

अच्छे से कट जाता है समय कविता पढ़ने – लिखने से , मन को मिलता है बहुत सुकून कविता पढ़ने – लिखने से , शब्द

सनम तन्हाई में हम बस तेरा ही नाम लेते हैं तेरी खातिर ही सर अपने सभी इल्जाम लेते हैं किसी के काम आ कर हम

अब बहारें भी मेरे घर में,आती नही है, अब हवाएं भी तेरा,संदेशा लाती नही है ।। किस ओर चले गए,तुम छोड़कर मुझको, ये सदायें भी

अब अपने किरदार से, इंसाफ कर दिया जाए, अंधेरे घर में अब एक,चिराग रख दिया जाए । जब तक कोई भूखा सोए, मेरे देश में

धन्य धन्य गुरु गोविंद सिंह, है धन्य तुम्हारे लाल । धन्य तुम्हारे त्याग है, है धन्य धन्य बलिदान ।। ऋणी रहेगा युगों युगों तक, ये

कब तक पिंजड़े में तड़पते रहेंगे, कब इन पंखों को हम फैलाएंगे । हम स्वतंत्र नभ पर विचरण करने वाले, अब इस पिंजरे में न

विनाश हुआ कौरव वंश का, पांडवों ने विजय थी पाई युधिष्ठिर का राजतिलक करके, द्वारिका को लौट गए कन्हाई, जाने क्यूं धर्मराज का, ह्रदय बहुत

अंग्रेजी वाले साल की, अंग्रेजी में ही बधाई हो । बहार मिले हर कदम पे, कोई न उदासी छाई हो, पुष्पों की बगिया महके, सुगंध

टूटे मन के भ्रम सभी,हुआ नहीं विश्वास, प्रण कर ले अब तो मना,नहीं किसी की आस। नहीं किसी की आस,भरोसा खुद पर करना, रिश्ते तो