पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

कविता

किसान दिवस

तुम लिख रहे हो, न उस किसान की महानता,जिसके खेत की फसल ,आप तक पहुंचते पहुंचतेजाति परिवर्तन कर लेती है ,अपना ईमान धर्म,सब बेंच देती

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कविता

तुमने फिर से बना लिए नए किरदार

तुमने फिर से बना लिए नए किरदार,मुझे, मेरी तन्हाई, मेरी बेवफाई को lतुम्हारी,कलम लिखते लिखते दौड़ने लगी,कागज़ पर कुछ नई कहानी सजोने लगी lतुम्हारे,जज़्बातों ने

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कविता

यादों के नाम ख़त

एक ख़त लिखना था,तुम्हारी यादों को lजो, भूल सी गयी,कई सालों से इस दिल का पता lऔर करके तन्हा,दे दी है इस दिल को सजा

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कविता

पिता के जूते

जब पैदा हुआ था,पिता केचमड़े के जूतों में थी चमक lउसके जिस्म से आती थी ,ऐशों आराम वाली महक lमाँ रानी सी रहती थीं,पिता राजा

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कविता

तुम, मैं और हम

तुम थे,मैं था ।थोड़ा थोड़ा सा अहम था l“तुम” में “तुम” भरपूर था,और मुझमें “मैं” l मैं ऋणात्मक सा था,एक छोटी सी लकीर ,वहम के

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पद्य-रचनाएँ

तुम मिले ऐसे

तुम मिले ऐसे, कोई मिलता कहाँ ऐसे,जिन्दगी नाचती जैसे, धड़कनें गाती हो जैसे llबरसती बारिश की बूँदें, मयूर नाचता हो जैसे ,सूरज उगता हो जैसे,

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कविता

बतियाती हैंअक्सर तुम्हारी यादें

बतियाती हैं अक्सर तुम्हारी यादें,कहती हैं, फिर इश्क़ करना है मुझे ll सोचता हूँ डरता हूँ फिर तन्हाईयों सेकैसे अब खुद से लड़ना है मुझे

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कविता

कभी मिलो तुम

कभी मिलो तुम,जहाँ पर “मैं” न हो lहो सिर्फ “मय” आंखो की,जहाँ शेह और मात की चाह न हो l कभी मिलो, सिर्फ मेरे होने

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