
निरूत्तर सी मैं
वाह रे मेरे समाज चरित्र का परिचय हर बार “स्त्री” ही क्यों देती है? जबकि चरित्र को खराब करने का काम “पुरुष” ही करता है..!

वाह रे मेरे समाज चरित्र का परिचय हर बार “स्त्री” ही क्यों देती है? जबकि चरित्र को खराब करने का काम “पुरुष” ही करता है..!

आज भी वही मुलाकाते,बातें,वादे,इरादे वही आंतरिक अनुभूति की सिहरन सी मुझे स्वयं के भीतर कराती अहसास कि काश न किया होता स्वयं से समझौता आज

ऐ जिंदगी..! मैं दिशाहीन नहीं हूँ बस तुझे समझने को प्रयासरत हूँ कभी परिभाषित तो कभी शून्य पाती हूँ कभी खुद को खुद में समेट

वक़्त कट जायेगा कठिन भी सुनता आया था लोगों से मैं पर साथ मेरे क्या बेबसी है वक़्त मुझको ही काटता है वक़्त मुझको ही

मुसलसल गम मेरे हालात में है। मैं तनहा नहीं जख्म साथ में है।। ज़माने भर की दौलत फीकी लगे, जो सुकूं वस्ल-ए-लम्हात में है।। जरा

तीर जितने उसने मारे सब निशाने पर लगे । ज़ख्म सब के सब पुराने ज़ख्म से बेहतर लगे । हो गया है जाने मुझको क्या

मनवा प्रिय दर्शन की आस। कितने सावन बीत गये हैं मिटी न अजहूं प्यास।। माया ठगिनी है भरमावत अंत में करे उदास। मृगतृष्णा न मिटी

शीषफूल मुक्ताजाल चूड़ामणि मांगटीका, कुमकुम बिंदी खेलड़ी सजावति शीश कामिनी। कर्णफूल पीपलपत्रा छैलकड़ि कोकरु बाली, झेला झुमकी माकड़ी झमकावति गजगामिनी। चूनी नासामोती ठुमकी नथ बजट्टी

गमे रुसवाई ज़ख्म दर्द-ए- जलन क्या है। ऐ नये साल बता तुझमें नयापन क्या है।। चांद को छूने की उम्मीदें पाल ली हमने, पूरी जो

नव वर्ष का नवल प्रभात अति सुखद सुवास हो। निर्झरिणी बहे स्नेह की जन जन में प्रेम प्यास हो।। प्रिय से मिलन की चाह हो,