पद्य-रचनाएँ

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पद्य-रचनाएँ

उमंगों की पतंगे उड़ाओ

उमंगों की पतंगे लेकर आओ मचाए हम भी शोर।गली गली घूमते गाते चले आई है सुहानी भोर।जीवन में उड़ानें भर आओ चले खुशियों की ओरप्यार

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पद्य-रचनाएँ

ठिठुरन(मनहरण घनाक्षरी)

सर्द हवा ठंडी ठंडी, बहती है पुरजोर।ठिठुरते हाथ पांव, अलाव जलाइए। कोहरा छा जाए जब, शीतलहर आ जाए।कंपकंपी बदन में, ठंड से बचाइए। सूरज सुहाती

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कविता

नव जीवन उत्सर्जन

नव जीवन उत्सर्जन करती उद्बोधन प्रकृति मानो जगा रही मानव को चिरनिंद्रा से देखो कैसे नव उत्सर्जन फिर से भरता प्राण न हो सुसुप्त ए

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गज़ल

तुम्हारी बेख़ुदी के हम कभी तो राज़दाँ होंगे

तुम्हारी बेख़ुदी के हम कभी तो राज़दाँ होंगे कभी कू-ए-वफा में फिर मिले तो हमज़ुबां होंगे अना की बेख़ुदी होगी अभी कुछ फ़ासले होंगे जहां

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गज़ल

हर मंज़र आज़ार हुआ

दरवाज़ा दीवार हुआ बिन दस्तक बेज़ार हुआ रिश्तों के सब झूठ खुल गए जब मोहसिन तलवार हुआ लंबी चुप और दिल भी खाली, निस्बत की

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गीत

बस चलना है

बस चलना है खा़मोश अँधेरी रातों में बस चलना है इक दिन तो रोशन होगी ये तब तक ऐसे ही जलना है बस चलना है

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कविता

यह प्रेम अगर फिर अपना होता

यह प्रेम अगर फिर अपना होता मैंने भाग्य सँवारा होता तुम मिलते फिर फिर से मुझको क्यो प्यार मेरा बञ्जारा होता कुछ भी मेरे पास

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कविता

हां, मौन हूँ मैं…!

हाँ, मौन हूँ मैं…! कहता कुछ नहीं फिर भी सब समझाता हूँ। शब्दों से हौड़ नहीं फिर भी चीख़-चीख़ बतलाता हूँ। एक रिश्ता हूँ सुर्ख

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