
मैं
एक “मैं” दूसरे “मैं” के साथ , बैठ बात कर रहे थे l “मैं” बोल रहा था बिना जुबां चलाये , और मैं सुन रहा

एक “मैं” दूसरे “मैं” के साथ , बैठ बात कर रहे थे l “मैं” बोल रहा था बिना जुबां चलाये , और मैं सुन रहा

तुम्हारी नज़रों के सामने, सब बदल रहा था l पर तुम शांत थी ll जैसे कोई, तालाब में पत्थर फेंक, किनारे खड़ा, देखता रहता है

तुम वक्त सी निरंतर मुझमें चलती हो, मैं मौसम बन बदलता रहता हूँ ll कभी खुद के अन्दर का अंधेरा लिए, उजालों में भटकता रहता

सांसों का दरिया बहे , बंजर तन के बीच । पुण्यों की रसधार से , चल कर्मों को सींच । प्यारी सच्चाई नहीं , प्यारा

कनक कटोरी कर्ण कर्णफूल किंकिणि सुनि, कोटि-कोटि काम कूदि कूदि चलि आवत है। खन-खन-खनकार खंजनिका के कंगन करें, सृष्टि में संगीत की सुर सरिता बहावत

शेष सुता लंकेश बहू घननाद प्रिया लंका युवरानी। सती सुलोचनि चारों युग में अमर रहेगी तेरी कहानी।। साज कर चतुरंगिनी इन्द्रदमन जब चलने लगा, मान

आख़िर क्या है..? क्यों है ऐसा..? जिंदगी जीने में सही गलत क्या हैं सही गलत के बीच में ऐसा क्या हैं जो दोनो में अलगाव

तूफानों का जोर लगाकर समय नया लिख जाएंगे आज हिमालय के माथे पर सूरज नया उगायेंगे गरजेगा यह सिंधु उफनकर राह नई दिखलाएगा मातृभूमि के

सितम यूं मुझपे ढा रहा है कोई। नज़र झुका के जा रहा है कोई।। बढ़ी धड़कन बता रही मुझको, मेरे दिल में समा रहा है

छिपा छिपा सा राज प्रकृति का जो देता संदेश सूर्यास्त बता रहा है मुझे कि वो चला शाम ढलते ही अंधेरे के आगोश में मिलता