
दोहें-हम बैरागी हो गए
हम बैरागी हो गए , मत अब डोरे डाल । खारा पानी मन हुआ , नहीं गलेगी दाल । मुखड़ा उस मासूम का , जैसे

हम बैरागी हो गए , मत अब डोरे डाल । खारा पानी मन हुआ , नहीं गलेगी दाल । मुखड़ा उस मासूम का , जैसे

न काहू से ऐ यारी, न काहू से प्यार,सबके मन मे राम है, राम मैं बहे माघक बयार,आप किजूँ, अपना-अपना व्यापार,बस मुद्रा राम नाम के

अजन्मी बेटियों के खून से रंगा ये समाज,मुझे हत्यारा दिखाई देता है ये समाज।शहरों से लेकर गांव तक, नगरों से लेकर कस्बों तक ,मुझे हत्यारा

उम्र बस थोड़ी बची है काम बाक़ी हैं बहुत । एक था आग़ाज़ पर अंजाम बाक़ी हैं बहुत । यूँ रिहा हूँ अब मैं तेरी

आप शम्आ हो और हम परवाने हैं आये हम आप पे ही तो मर जाने हैं आप जब भी जलोगे जहाँ जानेमन हम भी जलने

इश्क़ का रोग पाल कर देखो अपने दिल को उबाल कर देखो मै समंदर हूँ मुझमे मोती हैं आओ मुझको खँगाल कर देखो तुमको अपना

उनको हम भी प्यार करेंगे क़िस्तों में । मर मर कर हम ख़ूब जियेंगे क़िस्तों में । बोझिल पंखों में अब भी काफ़ी दम है

हम गौतमबुद्ध, की शांति हैं,भगवान महावीर की, अहिँसा हैं।बजरी के भी, लाल हमहीं,कार्लमार्क्स वाले, सर्वअहारा हैं। हाँ, हम अपनी, मजूरी ख़ुद ही,कमाने वाले है,हम लाल

राजा गए प्रजा जब आए भवा देश कय बंटाधार। बढ़ी गरीबी हल्ला बोल चारिव लंग बस भ्रष्टचार।। लोकतन्त्र मा लुटेक पाईन नेतक खुलीगा देखो पोल।

प्रकृति से जीवन हय हम सबके प्रकृति से पियार करव। प्रकृति कईहां नकसान ना पहुँचाव उके कहर से डरव ।। प्रकृति भगवान कय रुप प्रकृति