
ऋतुराज बसंत का आगमन
जैसे सूरज ने खोल दिए हों चितवन झूम उठी है धरती गगन धरती नभ थल में फैल गई दिनकर की स्वर्णिम किरण खिल उठी कलियां

जैसे सूरज ने खोल दिए हों चितवन झूम उठी है धरती गगन धरती नभ थल में फैल गई दिनकर की स्वर्णिम किरण खिल उठी कलियां

कहाँ गये वो दिन जब घर घर होली थी, केमिकल का भय नहीं मन में होली थी। सन्नाटो का काम नहीं, हुड़दंगों की होली थी।

बसंत ऋतु के आगमन पर जैसे बगिया फूलों से महक जाती है, वैसे उन्हें देख मेरी पलकें शर्माकर आँखों से चिपक जाती है। हरे भरे

पलट के ना देखूँगी जो मुझे मिला नहीं, इस होली कोई शिकवा कोई गिला नहीं। छांछ और भांग का छायेगा जो खुमार, हंसी से लोट

नीले पीले लाल गुलाबी, गोरी रंग लेकर आई। फागुन आयो रंग रंगीलो, उर उमंग मस्ती छाई। रसिया नाचे ढप बजावे, आज बिरज में होली है।

होली आई विहसा अंबर प्रकृति हुई सुहानी । सात रंग से भीगी धरती ओढ़ी चूनर धानी ।। बसंती बयार बह रही तन में सिहरन लाई

रंग दे पिया मोहे रंग दे गुलाल। भर पिचकारी रंग डारे है लाल। फागुनी मौसम फिजाएं खिली। मदमस्त मस्तानी हवाएं चली। लबों पे तराने दिल

रंग दे पिया मोहे रंग दे पिया भर पिचकारी रंग खेले पिया फागुनी मौसम फिजाएं खिली मदमस्त मस्तानी हवाएं चली लबों पे तराने दिल खिलने

फागुन का महिना आया रंगीला मौसम आया –२ रंगीला मौसम आया होली का उत्सव लाया –२ आज अवध में उत्सव मनाएं आओ खेलें होली –२

चलो नंदलाल के भवन में कान्हा संग खेलें होली। थोड़ी खेलेंगे हम होली, थोड़ी करेंगे ठिठोली —२ सलाह करे आपस में मिलके सखियां सब भोली-भोली।