कविता

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महादेव भोले भंडारी

श्री हरी श्री हरीमहादेव भोले भंडारीजो भोले का नाम जपेउसकी सारी विपदा टारीतुझसे राम तुझसे ही नारायणग्रंथ पवित्र करें हमेंतेरी कृपा बरसे त्रिपुरारीसारा जग तेरे

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कुर्बान-ए-आजादी

ये आजादी नहीं हमने,कोई उपहार पाई है।हमारे राष्ट्र भक्तो ने,लड़ी कितनी लड़ाई है।।न जाने लाल कितने,इस जगत जननी ने हैं खोए।तभी जाके सभी अवनी में,हम

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जानकी से बोले महावीर

जानकी से बोले महावीर हो अधीर मातु,प्रश्न एक आप बड़ा मन में जगाती हो।करती नही हो समाधान न विधान स्वयं,करती जो प्रभु हेतु मुझे सिखलाती

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स्पर्धा

निरंतर आगे बढती चल तू मंजुकभी निराश न होना बस चलती जानान हताश होना बस बढ़ती जानाआगे आगे चलना होगानही पीछे मुड़कर कभी देखना होगातू

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साथ अपनो को

प्रकाश का मार्ग, अतिसुंदरदेखने मे मनमोहित होता हैंपर न जाने क्यो मुझे रीतापन सा लगता हैंचारो और रंगीन लाइटो की चकाचोंध तो है बेशकपर क्या

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निष्कर्म

निष्कर्म भाव से ही,प्रकृति देती हमको सबक्यो फिर पीछे हैं मानव उसके पोषण में अब।धरा के रूप को नमी को सवारना होगा अबअब चेत जा

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अनाम रिश्ते

इस दुनिया में न जाने कितने, रिश्तों की यहाॅ॑ भरमार हुई। दिल का रिश्ता सबसे प्यारा, दुनिया खुशियों से गुलजार हुई। कुछ बन जाते अनाम

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कविता का औघड़

वन के दुःख दर्द अमंगल, सबसे प्रीत निभाऊंँ रे। मैं कविता का औघड़ साधू, धूनी अलख जगाऊँ रे।। जिनकी खुशियों को सपनों के चन्द लुटेरे

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प्रेम

मौसम का फिजा यू बदलने लगा ना तुम होश में थे ना मैं होश में लगा देखा जिस ने उसी ने कहा ये कौन सा

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