कविता

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बेजुबान की पीड़ा

बेजुबान है तो क्या कोई जज्बात नही है, मां के पेय पर शिशु का क्या अधिकार नहीं है। कौन सा मुंह दिखलोगे,दुनियां बनाने वाले को,

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विनाश की झांकी

कभी भूमि फट रही है,कभी धरती हिल रही है देखो अब विनाश की,झांकी भी दिख रही है। भूस्खलन, तूफान,बाढ़ से,सब त्राहि माम कर रहे है,

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शिव शंकरा

बम बम भोलेत्रिशूल धारी त्रिपुरान्तकारीदेह भस्म सारीमंथन किया सफलविष का पीया गरलसिर पर माँ गंगागले लिपटे भुजंगानटराज भोले बाबाअद्भुत अर्धनारीश्वर मेरे बाबाडमरू तांडव सजाएभांग घोट

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जिजीविषा

अब हर पल लगने लगा हैन जाने क्यों कि कुछ पीछे छूट सा गया हैंक्या छूटा समझ से परे ही लगता हैंएक रिक्तता सी लगने

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नव जीवन उत्सर्जन

करती उद्बोधन प्रकृति मानोजगा रही मानव को चिरनिंद्रा सेदेखो कैसे नव उत्सर्जन फिर से भरता प्राणन हो सुसुप्त ए वृक्ष तू हो फिर तैयारसत्य यही

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सुनो ना

सुनों..ना तुमबहुत बातें करती हूँ मैंअक्सर तुमसेन जाने क्योंसामने होने पर बोलनहीं पाती हूँपर अपनी लेखनी सेअपनी कविताओं मेंबात कर लेती हूँअपने मन केसारे भावओर

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कफ़न तिरंगा

मैं नही किसी से बैर भाव रखती हूँबस देश के काम आ सकूँ यही भाव रखती हूँदेश की मिट्टी माथे से लगाकर फक्र महसूस करती

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शिव : एक अनुसरणीय जीवन

भोले भंडारी शिव सत्य सन्यासी, सदा रहे ध्यान मगन शम्भू अविनाशी, भूत-प्रेत गण शिव संग चलत हैं, दीन हीन पद स्वारथ कर बनाते विश्वासी,  

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आया है बसंत

आया है बसंतमन में लाया है उमंग ।चलो खुशी से नाचे हमदेखो नाच रहें है भुजंग ।। कोयल की आवाजमन में मिठास भर देती है

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