कविता

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चलता पागल पांव हमारा

अब भी पगडंडी राहों पर, चलता पागल पांव हमारा।बिते दिन की यादों को ले, खड़ा यह पीपल छांव पसारा।सन-सन करती चलती पूर्वा,संदेशा किसकी लाती है,बरसों

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जोगीरा

मेरे गुरु, भोले भंडारी, उनके गुरु गोसाई।बज्रिका मेरी वैशाली वाली, मिथिला वाली, सीतआमाईअब सुनो जोगीरा, भाई।जोगीरा स र र र र जोगीजी, जोगीजी वाह जोगीजी,राधा,

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नगर

हो उद्धार शहर का मेरे आप बनाए सवेरे अब तो कुछ प्रण करो शहर को मेरे स्वर्ग करो नालियों में है कूड़ा करकट मच्छर भी

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भक्त

  स्वागत है वंदन तेरा  तू बना ले चंदन मेरा  दमका करूंगा मैं भी  तू अपना ले अभिनंदन मेरा    गंगा को मिला संग तेरा

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माँ का दर्द

पार जाके सात सेतू रहनुमा जो बन गए छोड़ अपनापन पराए गुलिस्ता के हो गए याद में उनकी सदा ही मा तड़पती रह गई लौट

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रूह में मिलने का इरादा बहुत ज्यादा था

रूह में मिलने का इरादा बहुत ज्यादा था खुद को योग्य समझूं ये नासमझी बहुत ज्यादा था । मिले थे जिस कदर जिन यादों ने

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