
प्रेम रोगी
हे प्रेम ! की बहती हवाओं सुनोंमैं हूंँ नही कोई निरोगीमुझे बचालो उसके कदमों सेअब मैं हूंँ एक गुलाम प्रेम रोगी । अब खो रहा

हे प्रेम ! की बहती हवाओं सुनोंमैं हूंँ नही कोई निरोगीमुझे बचालो उसके कदमों सेअब मैं हूंँ एक गुलाम प्रेम रोगी । अब खो रहा

मांँ शारदे करुण नयन सेमेरा जीवन उद्धार करोमुझ पर दया करो मातामेरा जीवन आभार करो । मैं मूढ़ ,मासूम जिसमेहै न साक्षरता का वासऔर कितने

शहर से घटा बिखरता हुआघूम रहा चंचलियों मेंआज भी भटक रहा है मेरा दिलरायपुर की गलियों में । छत्तीसगढ़ की राजधानी मेंसूरज का तेज निखरता

चाहत आगे बढ़ने की हो पढ़ना लिखना सीखो।चाहत कुछ करने की हो तकदीर से लड़ना सीखो। चाहत कवि बनने की हो, लय को मन में

मानवता एक सच्चा धर्मार्थ हैनहीं कोई इससे बड़ा कर्मार्थ है।जाति धर्म से ज़रा हटकर देखो।मानव सेवा ही सच्चा परमार्थ है। मानवता सच्चा सेवा परोपकार है।जीव

मंजिले दूर होती रही राश्तों का कसूर होगा यह कोई नहीं सोचता रास्तों को चुनना भी तो हमारा दस्तूर होगा मंजिले नजदीक होंगी रास्तों को

माँ होती है तब जा कर एक वंश खानदान बनता है बेटे बेटियों पर सब कुछ वार दिया करती है तब जा कर वंश का

व्याकुल मन से कह रहा हूंँतुमसे इजहार है रानीतुमसे प्यार है रानीतुमसे प्यार है रानी तेरी आंखे समंदर सा हैमैं उसमे बहता पानीकण–कण में तेरा

बलिदान वीर सपूतों का…..इतिहास में अमर हैवो आज भी अमर हैवो आज भी जिंदा है वो आत्म स्वाभिमानजिसने झुकना कभी न जानामरते दम तक अंत

हे राम !तुम्हारे चरणों मेंमेरा जीवन कट जाएमुझ पर कृपा करो प्रभो !मुझको न फुल समाए। तुझमें ही बसे मेरे आत्मातुझ पर ही जान गवाएमुझ