समीक्षा :- कोचिंग @कोटा(उपन्यास)

उपन्यास : कोचिंग @कोटा

लेखक : अरुण अर्णव खरे

ए पी एन पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित

समीक्षक- अतुल्य खरे

विगत कुछ वर्षों में राजस्थान का कोटा शहर एक विशाल शैक्षणिक केंद्र के रूप में उभर कर सामने आया है । देश के प्रीतिष्ठित इंजीनियरिंग एवं मेडिकल कालेजों में प्रवेश हेतु बढ़ती गला काट स्पर्धा के बीच कोटा के कोचिंग संस्थान सफलता की एक गारंटी बनकर उभरे हैं । अभिभावकों एवं छात्र छात्राओं की मानसिकता “कोटा में पढे बगैर प्रवेश नहीं” वाली बन गई जिसका भरपूर फायदा चंद कोचिंग संस्थानों को मिला है, एवं वर्तमान में तो कोचिंग संस्थानों की बाढ़ सी आ चुकी है कोटा शहर में ।

चंद कोचिंग संस्थानों नें काफी नाम भी कमाया है एवं परिणामस्वरूप सम्पूर्ण राष्ट्र से किन्तु विशेष तौर पर राजस्थान के समीपवर्ती राज्यों यथा मध्य प्रदेश , गुजरात , उत्तर प्रदेश से आने वाले किशोरों की संख्या बहुलता से है एवं विगत कुछ वर्षों में उत्तर एवं पूर्वोत्तर भारत से आने वाले छात्रों की संख्या में भी बहुत ज्यादा इजाफा हुआ है । हालांकि वास्तविकता वही है की यहाँ आने के पश्चात भी मात्र वही छात्र या छत्राएं प्रवेश पाते हैं जिन्हें प्रवेश तब भी मिल ही जाता यदि यहाँ दाखिला न भी लेते , उन्हें सफलता तो उनकी प्रतिभा के अनुसार मिलना ही थी।

अरुण अर्णव खरे जी द्वारा रचित उपन्यास कोचिंग @कोटा भी इसी कोटा शहर के बारे में है। खरे जी ने अपनी इस कृति में इतने विस्तार से कोटा की कोचिंग की हर बात समेटी है की उस बारे में बहुत ज्यादा कहना न तो आवश्यक प्रतीत होता है न ही उचित होगा की हर बात को विस्तार से यहाँ लिखा जाए।

उपन्यास सहज एवं सरल भाषा में कोटा की बातें बताती हुयी एक सामान्य सी कहानी ही है किन्तु उस कहानी में बहुत से अंतर्निहित विषय भी हैं जिन्हें उन्होंने प्रमुखता से उठाया है।

इस पुस्तक की समीक्षा में उन्हीं अंतर्निहित विषयों पर केंद्रित करना अधिक उचित प्रतीत होता है।

यूं तो कथानक एक किशोर वय छात्र समीर को केंद्र में रख कर लिखा गया है किन्तु इस पात्र व चंद अन्य सहयोगी पात्रों के मार्फत वरिष्ठ रचनाकार कोटा के कोचिंग संस्थानों , बच्चों के संस्कारों , भविष्य में अपने कैरियर के प्रति गंभीरता, उच्श्रंखलता , कम उम्र में पनपती बुरी आदतें, आधुनिकता व तड़क भड़क के प्रति तीव्र आकर्षण इत्यादि विषयों पर विस्तार से अत्यंत ही रोचकता के संग प्रस्तुत करने में सफल हुए हैं।

कहानी यूं तो बच्चों के कोचिंग हेतु कोटा में रहने की व तैयारी करने की है किन्तु इस विषय के साथ लेखक ने कोटा की कोचिंग के विषय में गहन समीक्षा करी है , कोचिंग लेने हेतु जहां प्रतिभाशाली बच्चे पहुँच रहे हैं वहीं समाज की देखा देखी की आदत पर तंज़ करते हुए व नाकाबिल एवं अन- इक्षुक बच्चे को भी मात्र दिखावे हेतु अभिभावकों द्वारा कोटा भेजने को भी कथानक में शामिल किया है फिर ऐसे ही बच्चे कोटा आकर महज मौज मस्ती ही करते है, इसी के साथ उन्होंने बहुत प्रमुखता से किशोर वय के लड़कों के शारीरिक शोषण के विषय को भी उठाया है व कथा के विभिन्न पात्रों एवं स्थितियों के जरिए इस विषय पर ध्यान आकृष्ट किया है।

वहीं किशोरों द्वारा परिवार की इकक्षाओं को पूरा कर पाने में स्वयम को सक्षम न पाते हुए , अपने माता पिता के अरमानों की मंजिल पा लेने में असफल अथवा स्वयम को अन्यथा कहीं कमजोर पाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेने की तेजी से बढ़ती प्रवृत्ति पर भी लिखा है।

अधिकांश बच्चे उम्र की उस अवस्था में वहाँ पहुंचते हैं जब न तो वे युवा हुए है न ही किशोर रहे है , व जहां एक ओर उनमें हो रहे शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन उन्हें परेशान करते हैं वहीं पढ़ाई का अत्याधिक दबाव भी उन्हें तोड़ देता है। कुछ जो सुसंस्कारित है, अच्छी संगति में रहते हैं वे सफलतापूर्वक यह दौर पार कर लेते हैं अन्यथा कुछ इस दौर में फिसल जाते हैं व फौरी तौर पर तड़क भड़क व कुछ सुविधाओं से भ्रमित हो अपना कैरियर समाप्त ही कर गुजरते हैं।

कहानी का प्रारंभ छतरपुर शहर से कोटा आए एक तरुण समीर जो की एक संस्कारित , एवं पारिवारिक किस्म का ,शर्मिला ( कुछ हद तक दब्बू भी कह सकते हैं) मेधावी तथा आज के रईस संतान के कुप्रभावों से दूर है, के कोटा पहुचने से शुरू होती है। उसका रहने खाने का इंतजाम जहां होता है वह बुजुर्ग दम्पत्ति भी बेहद केयरिंग , सुलझे हुए एवं मिलनसार हैं। विपरीत ध्रुव के बीच आकर्षण होता है यह बात तब बहुत सटीक प्रतीत होती है जब कोचिंग में ही समीर की मुलाकात जो कि आगे चलकर मित्रता में बदल जाती है , देवास से आई एक बिंदास , मुखर लड़की चित्रा से होती है । उसकी संगत में धीरे धीरे समीर में कुछ परिवर्तन आते हैं किन्तु सबसे बड़ा परिवर्तन शायद यही होता है की समीर प्यार को समझने की चेष्ठा करने लगता है।

समीर चित्रा से पढ़ने के गुर सीखता है व उत्तरोत्तर प्रगति करता है .अन्य सहपाठियों के किस्से व मकान मालिक से भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है । वरिष्ठ कथाकार ने कोटा के विषय में अमूमन प्रत्येक उस बिंदु को अपने कथानक में समेटा है जो वहां जाकर के एक सामान्य बच्चे के दैनिक जीवन में दर पेश होते हैं।

वहां पहुच कर शिक्षण संस्थान में सर्वथा नवीन माहौल , नए लोगों की संगत और उस पर शीघ्र ही शुरू हो जाने वाले वाले साप्ताहिक टेस्ट , रैंकिंग और उन सब पर सबसे ऊपर प्रारंभ से ही अच्छे परफॉर्मेंस का दबाव ।

वहीं पी जी का माहौल , खाने की फिक्र भी बड़ी समस्या होती है हालांकि इस कथानक में खरे जी ने उसे आसान कर दिया है, तथा पी जी के सहृदय, मिलनसार, एवं जिंदादिल मार्गदर्शक, पितृवत, वासवानी अंकल जो बच्चों के मनोविज्ञान को भी अच्छे से समझते हैं , उनका अच्छा , व्यवहार एवं उनकी धर्मपत्नी द्वारा दिए जा रहे घर के खाने के कारण इन विषयों को जो की कोटा आने वाले बच्चों की सबसे बड़ी समस्या होती है उसे कथानक में अनछुआ रखा है। तथा इस ओर से परिवार की भी से निश्चिन्तता दर्शायी है ।

मेरी बिटिया जो की अब एक ख्यातिलब्ध सर्जन हैं ने भी कोटा से मेडिकल प्रवेश परीक्षा हेतु तत्कालीन एक मात्र ख्यातिलब्ध संस्थान में प्रवेश लिया था एवं उनके अध्ययन के दौरान जो कुछ मैने देखा था शहर , संस्थान एवं बच्चों के विषय में , सभी कुछ सच ही लिखा है व इस पुस्तक को पढ़ते हुए बीस वर्ष पुराने अनुभव पुनः आंखों के सामने जीवंत हो उठे । लेखक ने वास्तविकता ही शब्दों में उकेर दी है । हाँ रोचकता बनाये रखने हेतु कुछ दृश्य जोड़े हैं जो सहजता से सम्मिलित हुए हैं तथा अतिरिक्त प्रयास सम प्रतीत नहीं होते ।

सर्वश्रेष्ठ परफॉर्मेंस , निरंतर आगे बढ़ने का दबाव एवं परिवार के सपनों तथा आकांक्षाओं पर खरा उतरने के दबाव के चलते , बच्चों द्वारा, अप्रत्याशित, अनुचित, एवं गलत कदम उठा लेने की घटनाएं वहां बाज़ दफा सुनने में आती हैं जो निश्चय ही चिंताजनक हैं इस विषय को उपन्यास में बार बार उठा कर विशेष ध्यानाकर्षण के साथ सामने रखा गया है । ऐसे अभिभावक जिनके पाल्य अभी उम्र के इस दौर से गुज़र रहे हैं , उन्हें यह पुस्तक बहुत कुछ सिखाती है । यह पुस्तक ऐसे लोगों को अवश्य ही पढ़ना चाहिए ।

वहीं कोटा में आने वाले कुछ बच्चे जो या तो स्वयं अपने भविष्य के प्रति उतने गंभीर नहीं हैं अथवा संपन्नता के प्रभाव में या फिर संस्कारों में कुछ ऐसी कमी रह जाती है कि वे परिवार के नियंत्रण से दूर होते ही यहाँ आकर कम उम्र के चलते नासमझी में ही , मौज मस्ती को ही सब कुछ मान कर उसमें आकंठ डूब जाते हैं जिसका फायदा खत्री उर्फ खन्ना उर्फ पटेल जैसे गलत लोग भी उठाते हैं तथा सुविधाओं एवं कुछ तोहफों के बदले इन किशोरों का शारीरिक शोषण भी करते हैं , किशोर वय बच्चे उनका गंदा खेल जब तक समझ पाते , वे उनका जीवन एवं भविष्य नष्ट कर अगले शिकार को फंसाने में लग जाते हैं, लड़कियों की स्थिति तो और भी चिंताजनक हो जाती है, जब या तो उनके अश्लील वीडियोज़ वायरल हो जाते हैं अथवा गर्भधारण जैसी अनचाही स्थिति बन जाती है जो जीवन के अकाल अंत अथवा अवसाद की ओर ले जाते हैं ।

बेहद गंभीरता से इस विषय को उठाया गया है तथा विचारण योग्य है ।

कोटा में रहते हुए इन किशोर वय के बच्चों को परिवार की याद विशेष तौर पर त्योहारों एवं विशेष अवसरों जैसे करीबियों के विवाहोत्सव इत्यादि में शामिल न हो पाने का दर्द यूं तो वे बच्चे ही बेहतर बयान कर सकते हैं किन्तु लेखक ने घर से दूर रहने का दर्द रक्षाबंधन को केंद्र में रख कर जिस तरह से वर्णित किया है वह भावुकता से परिपूर्ण है । वहीं समीर का अपनी दादी जिन्हें वह काफी चाहता है एवं उनके बहुत करीब है, उनकी मृत्यु जैसी घड़ी में भी न पहुच पाना विषय की गंभीरता को दर्शाता है कि परिवार इस कोचिंग को बच्चों के भविष्य को देखते हुए कितनी गंभीरता से लेता है ।

सम्पूर्ण नए माहौल में यूं तो कहने को हजारों बच्चे होते हैं किंतु प्रतिस्पर्धा की भावना मन में रहते हुए कोई किसी का मित्र तो शायद नही ही होता, सभी प्रतिद्वंदी हैं इस गला काट स्पर्धा में। उस बीच समीर की चित्रा से मैत्री सम्पूर्ण कथानक को बेहफ रोचक बना देती है ।

प्रेम क्या है, इस विषय पर सोच पाना किशोर वय में संभवतः असंभव ही है एवं इसे आकर्षण से अधिक शायद वे नहीं समझ पाते । चित्रा एवं समीर की मित्रता को क्या नाम दूं कि कशमकश यू तो स्पष्तः कोई बयान नहीं कर पाया किन्तु स्वयं समीर के व्यवहार से यह बात स्पष्ट हो जाती है । जोकि अंत में बहुत स्पष्ट हो जाती है ।

पढ़ाई के दबाव , साप्ताहिक इंटरनल टेस्ट , उनमें ऊपर नीचे होती रैंकिंग , उन रैंकिंग का मन पर पड़ता प्रभाव या कहें दबाव तथा प्री एवं मेन्स परीक्षाओं का दबाव बेहद वास्तविकता से दर्शाया है ।

कहानी का अंत रोमांचित करता है एवं बेहद भावुकता पूर्ण होते हुए भी बिल्कुल अप्रत्याशित है । चित्रा का पात्र बेहद सुंदरता से घड़ा गया है । उस पात्र के ज़रिए , प्रतिभा ,दर्द , प्रेम , वात्सल्य आदि भाव अत्यंत खूबसूरती से दिखलाए गए हैं । वहीं कोचिंग इंस्टीटूट द्वारा अपनी रैंकिंग अच्छी दिखलाने हेतु एवं इस व्यवसाय में और आगे बढ़ने की चाहत में भिन्न भिन्न गलत हथकंडे अपनाए जाते हैं कथानक में मात्र एक ही उद्द्वारण द्वारा दर्शया गया है अन्यथा हैं तो बहुत ।

अत्यंत रोचकता के साथ रोमांच भी बरकरार रखते हुए सरल, बोलचाल की परिवेश हेतु उपयुक्त सारगर्भित भाषा एवं वाक्यांश से युक्त एक साफ सुथरी रचना है जो कहीं भी बोझिल नहीं है तथा एक बैठक में पढ़ने हेतु बाध्य कर देती है ।

पुनः कहना चाहूंगा कि वे अविभावक जिनके बच्चे अभी उम्र के इस दौर से गुज़र रहे है उन्हें अवश्य ही पढ़ना चाहिए यह उनके लिए एक बेहतर मार्गदर्शिका साबित होगी ।

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रचनाकार

Author

  • अतुल्य खरे

    B.Sc,LLB. उज्जैन (मध्य प्रदेश)| राष्ट्रीयकृत बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक | Copyright@अतुल्य खरे/इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |

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