बस नजरिए का फर्क है।

बस नजरिए का फर्क है।

जीवन की अधिकांश उलझनें, विवाद, दुख और खुशी का मूल कारण एक ही है – नजरिया। यानी जिस चश्मे से हम दुनिया, घटनाओं, लोगों और खुद को देखते हैं। एक ही सूरज उगता है, एक ही बारिश होती है, एक ही असफलता आती है, फिर भी कोई रोता है, कोई मुस्कुराता है। फर्क सिर्फ नजरिए का होता है। सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है आधा भरा गिलास। एक व्यक्ति कहता है – “गिलास आधा खाली है”, दूसरा कहता है – “गिलास आधा भरा है”। दोनों सही हैं, पर दृष्टिकोण अलग है। पहला कमी पर फोकस करता है, दूसरा उपलब्धि पर। इसी छोटे-से फर्क से जीवन का रंग बदल जाता है। रिश्तों में भी यही सच है। एक पत्नी को उसका पति देर से मैसेज करता है। एक नजरिए से यह “उसे मेरी परवाह नहीं” लगता है, तो दूसरी से “वह बहुत व्यस्त होगा, फिर भी याद तो किया”। पहला नजरिया झगड़े और दूरी पैदा करता है, दूसरा समझ और करीब लाता है। पति-पत्नी, माता-पिता-बच्चे, दोस्त – हर रिश्ते में ८०% समस्या नजरिए की वजह से ही होती है।

करियर और सफलता में भी यही खेल चलता है। एक व्यक्ति नौकरी छूटने पर सोचता है – “मेरा करियर खत्म हो गया”। दूसरा सोचता है – “अब नया और बेहतर मौका मिलेगा”। पहला डिप्रेशन में चला जाता है, दूसरा कुछ महीनों में बेहतर पोजीशन पा लेता है। असफलता वही थी, पर व्याख्या अलग थी। समाज और देश की बात करें तो भी यही दिखता है। एक ही नीति, एक ही घटना, एक ही नेता – अलग-अलग लोग अलग-अलग अर्थ निकालते हैं। कोई कहता है “विकास हो रहा है”, कोई चिल्लाता है “सब बर्बाद हो रहा है”। दोनों के पास तथ्य लगभग वही होते हैं, बस नजरिया अलग होने से निष्कर्ष उलटे हो जाते हैं।

हमारा नजरिया हमारे अनुभवों, बचपन की सीख, पढ़ाई, दोस्तों, परिवार और पिछले घावों से बनता है। अगर बचपन से सुना कि “दुनिया बहुत खराब है”, तो बड़ा होकर भी हर इंसान में बुराई ही दिखेगी। वहीं, अगर सिखाया गया कि “हर इंसान में कुछ अच्छाई होती है”, तो हम अच्छाई ढूंढते फिरेंगे। सौभाग्य से, नजरिया स्थायी नहीं होता। इसे बदला जा सकता है। थोड़ी सी कोशिश, आत्म-चिंतन और सकारात्मक लोगों की संगति से हमारा दृष्टिकोण बदल सकता है। जब हम सवाल करते हैं – “इसमें क्या अच्छा हो सकता है?”, “मैं इसमें क्या सीख सकता हूँ?”, “दूसरे का पक्ष क्या हो सकता है?” – तो धीरे-धीरे नजरिया विस्तृत और उदार होने लगता है। सफल और सुखी लोग इसी कला में माहिर होते हैं। वे परिस्थितियों को नहीं बदल पाते, पर खुद को बदल लेते हैं। वे जानते हैं कि दुख आएगा, पर उसे कैसे देखें, यह हमारे हाथ में है।

अंत में यही सच है – जीवन में बहुत कम चीजें पूरी तरह हमारे नियंत्रण में हैं। मौसम, लोग, घटनाएं, किस्मत – ये सब आएंगी-जाएंगी। लेकिन हमारा नजरिया? वह हमारा है। हम उसे चुन सकते हैं। तो अगली बार जब कोई समस्या आए, कोई व्यक्ति समझ न आए, कोई सपना टूटे – बस रुकिए और पूछिए:  “क्या मैं इसे दूसरे नजरिए से देख सकता हूँ?”

 

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रचनाकार

Author

  • Dr. Rishika Verma

    Dr. Rishika Verma is working as Assistant Professor, Department of Philosophy, School of Humanities and Social Sciences in Hemavati Nandan Bahuguna Garhwal University, Srinagar (Garhwal) Uttarakhand, A Central University. She Completed her higher education, B.A., M.A., Ph.D. and Post-Doctoral Fellowship from Banaras Hindu University, Varanasi. Her 30 Research papers are published in National and international, UGC CARE and UGC listed journals. She presented 34 papers in national and international seminars and conferences. She has wirtten 3 books till now. she got many Awards and Samman like International Educationist Award, Best Young Woman Faculty Award, National YogaRatna Award, Sahitya Gaurav Samman, Hindi Utkrisht Sahitya Seva Samman, Woman Icone Award.

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